ओ३म् अ॒स्मभ्यं॑ त्वा वसु॒विद॑म॒भि वाणी॑रनूषत । गो...

ओ३म् अ॒स्मभ्यं॑ त्वा वसु॒विद॑म॒भि वाणी॑रनूषत । गोभि॑ष्टे॒ वर्ण॑म॒भि वा॑सयामसि ॥ सामवेद 575 पूर्वार्चिक पवमान काण्ड 10/10, ऋग्वेद 9/104/4 ल ला, ल ला, ल ला मनवा जा, मनवा जा रे जा रे मनवा जा, मनवा जा रे जा रे काहे आया है अकेला कहाँ गायक अलबेला आ गवैये को भी संग ले के आ मनवा जा, मनवा जा रे जा रे मनवा जा, मनवा जा रे जा आ तुझको पहचान बता दूँ वो लगता है कैसा ? सच्चे धन का देने वाला वो प्रभु एक ही ऐसा ऐसे याज्ञिक को हृदय में बसा लूँ खुद को यज्ञ भागी बना लूँ उसकी सारी विभूतियाँ हैं ज्योति-प्रदा मनवा जा, मनवा जा रे जा रे मनवा जा, मनवा जा रे जा भाव भरे हैं तेरे ही रंग में आ "प्रभु" खेलें होली रग-रग में ऐसे बस जाये, बोलूँ तेरी बोली धर्म पालूँ तो देना गवाही प्रार्थना भक्ति स्तुति का हूँ राही अमृत, धर्म-प्रचार का खूब पिला मनवा जा, मनवा जा रे जा रे मनवा जा, मनवा जा रे जा रे काहे आया है अकेला कहाँ गायक अलबेला आ गवैये को भी संग ले के आ मनवा जा, मनवा जा रे जा रे तर्ज :- चन्दा जा चन्दा जा रे जा रे रचनाकार व स्वर :- श्री ललित सहानी जी - मुम्बई अलबेला = अनुपम , अनोखा, अनूठा , बेजोड़, छैला, सुन्दर याज्ञिक = यज्ञ करने वाला (ईश्वर) विभूतियाँ = अलौकिक शक्तियाँ, प्रभुत्त्व, ज्योति प्रदा = ज्योति फैलाने वाली, वसु = सच्चे धन धान्य देनेवाला गवाही = साक्षी प्रमाण गवैया = गानेवाला, गायक
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