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एक नगर में एक मशहूर चित्रकार रहता था । चित्रकार ने एक बहुत सुन्दर त स्वीर बनाई और उसे नगर के चौराहे मे लगा दिया और नीचे लिख दिया कि जिस किसी को , जहाँ भी इस में कमी नजर आये वह वहाँ निशान लगा दे । जब उसने शाम को तस्वीर देखी उसकी पूरी तस्वीर पर निशानों से ख़राब हो चुकी थी । यह देख वह बहुत दुखी हुआ । उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करे वह दुःखी बैठा हुआ था । तभी उसका एक मित्र वहाँ से गुजरा उसने उस के दुःखी होने का कारण पूछा तो उसने उसे पूरी घटना बताई । उसने कहा एक काम करो कल दूसरी तस्वीर बनाना और उस मे लिखना कि जिस किसी को इस तस्वीर मे जहाँ कहीं भी कोई कमी नजर आये उसे सही कर दे । उसने अगले दिन यही किया । शाम को जब उसने अपनी तस्वीर देखी तो उसने देखा की तस्वीर पर किसी ने कुछ नहीं किया । वह संसार की रीति समझ गया । "कमी निकालना , निंदा करना , बुराई करना आसान , लेकिन उन कमियों को दूर करना अत्यंत कठिन होता है " This is life........ जब दुनिया यह कह्ती है कि ‘हार मान लो’ तो आशा धीरे से कान में कह्ती है कि., , , , ‘एक बार फिर प्रयास करो’ और यह ठीक भी है.., , , "जिंदगी आईसक्रीम की तरह है, टेस्ट करो तो भी पिघलती है;., , , वेस्ट करो तो भी पिघलती है, , , , , , इसलिए जिंदगी को टेस्ट करना सीखो, वेस्ट तो हो ही रही है., , , Intercast Marriage , The Vivah Sanskar will be solemnised, 16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777 Intercast Marriage , The Vivah Sanskar will be solemnised, 16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777
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क्या आप बड़े व्यक्ति बनना चाहते हैं? तो दूसरों का सम्मान करना सीखें। बड़ा व्यक्ति कहलाने का शौक तो प्राय: सभी लोगों को होता है। सब लोग चाहते हैं कि हम बड़े व्यक्ति बनें। लोग हमारा सम्मान करें, हमारी सेवा करें, हमें अच्छी-अच्छी वस्तुएं भेंट देवें, अच्छा भोजन भी खिलाएं पिलाएं और हम खूब आनंद करें। ऐसा सोचना कोई बुरी बात नहीं है, अच्छी बात है। बड़े व्यक्ति बनना चाहिए। धन सम्मान आदि सुविधाएं प्राप्त करनी चाहिएं। सुख से जीवन जीना चाहिए। परंतु जो भी काम किया जाए, वह विधिपूर्वक करना चाहिए, तभी वह कार्य ठीक तरह से संपन्न हो पाता है और तभी उसका ठीक प्रकार से लाभ भी मिलता है। तो बड़ा बनने का क्या उपाय है? इसका उपाय सीधा सा है। जो वस्तु आप दूसरों से प्राप्त करना चाहते हैं, वही दूसरों को देना आरंभ कर दें, आप बड़े व्यक्ति बन जाएंगे। आप चाहते हैं, कि लोग मेरा सम्मान करें, तो आप भी‍ लोगों का सम्मान कीजिए। आप चाहते हैं, कि लोग आपको धंधे व्यवसाय में सहायता करें, तो आप भी दूसरों की सहायता करना सीखें। आप चाहते हैं, लोग आपको अच्छा भोजन खिलाएं, आप की बढ़िया सेवा करें, जिससे आप को खूब आनंद मिले। तो आप भी दूसरे लोगों के साथ, ऐसा ही उत्तम व्यवहार करें। उन्हें अच्छा भोजन खिलाएं पिलाएं, इत्यादि। सार यह है, कि जो भी व्यवहार आप दूसरों के साथ करेंगे, वही लौटकर आपको मिलेगा। यह संसार का सामान्य नियम है। अपवाद सभी जगह पर होते हैं। कुछ लोग अपवादस्वरूप आपको ऐसे भी मिलेंगे, जिन्हें आप धन सम्मान भोजन आदि सब सुविधाएं देंगे। परंतु वे लोग इसका दुरुपयोग करेंगे, और आपको इस प्रकार का अच्छा व्यवहार उनसे वापस नहीं मिलेगा। ऐसे लोगों से इसकी आशा छोड़ दीजिएगा। परंतु अधिकांश लोग आपके साथ यथायोग्य उचित व्यवहार करेंगे। इसलिए जब आप मन में सोचते हैं कि मैं बड़ा व्यक्ति बनूं। तो यह भी साथ में सोचें, कि मैं दूसरे लोगों को भी बड़ा व्यक्ति बनाऊंगा। मेरे सामने उनको छोटा महसूस नहीं होने दूंगा। आपके ऐसा सोचने और करने पर, निश्चित रूप से आपकी इच्छा पूरी हो जाएगी। दूसरे लोग भी आपको छोटा महसूस होने नहीं देंगे, वे भी आपको पूरा सम्मान देंगे, और आप भी बड़े व्यक्ति बन जाएंगे। Intercast Marriage , The Vivah Sanskar will be solemnised, 16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777
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सुझाव देना बहुत कठिन और खतरनाक काम है। सब को सुझाव देने का अधिकार भी नहीं है, इसलिए अनधिकार चेष्टा न करें। अभी कुछ दिन पहले मैंने अपने संदेश में लिखा था कि भारत में बिना पूछे, बिना मांगे सुझाव देने की लोगों को बहुत बीमारी है। बार-बार उन्हें खुजली उठती है सुझाव देने की। क्योंकि लोग दूसरों का सुझाव सुनना नहीं चाहते। और बिना पूछे, बिना मांगे ही उन्हें रोज सुझाव दिए जाते हैं। इसलिए वे इन सुझावों से तंग आकर इस क्रिया को खुजली और बीमारी के नाम से बोलकर, अपना गुस्सा कुछ ठंडा कर लेते हैं। तो क्यों न इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए। जब कोई दूसरा व्यक्ति आपको बिना मांगे, बिना पूछे सुझाव देता है, तब आपको अच्छा नहीं लगता। क्या यही बात आप दूसरों के लिए नहीं सोच सकते, कि जैसे आपको दूसरे का बिना मांगा हुआ सुझाव अच्छा नहीं लगता, तो दूसरे को भी बिना मांगे आपका सुझाव सुनने पर अच्छा कैसे लगेगा? इसलिए विचार करें और बिना मांगे, बिना पूछे दूसरों को सुझाव न दें। सुझाव देते समय प्राय: बड़ी-बड़ी 3 गलतियां होती हैं। उन गलतियों को समझने का प्रयास करें और उन गलतियों से बचें। पहली गलती -- बिना पूछे, बिना मांगे किसी को सुझाव देना। विदेशों में ऐसा देखा जाता है कि जब भी कोई व्यक्ति किसी को सुझाव देना चाहता है, तो वह एक्सक्यूज मी, इन शब्दों से पहले पूछता है, क्या मैं आपको सुझाव दे सकता हूं? यदि दूसरा व्यक्ति कहे कि -- हां मैं सुनना चाहता हूं। तब वह अपना सुझाव उसको देता है। ऐसे ही आप सब को भी भारत में यदि किसी को सुझाव देना हो, तो पहले उससे पूछना चाहिए। कि मैं आपको इस विषय में एक सुझाव देना चाहता हूं. क्या आप मेरा सुझाव सुनना चाहते हैं? यदि वह कहे कि - हां बताइए. तभी आप अपना सुझाव दें। बिना पूछे न दें। अथवा वह सामने से कहे, कि इस विषय में आप मुझे कुछ सुझाव दीजिए. तो आप सुझाव दे सकते हैं। दूसरी गलती -- अपने से अधिक योग्य व्यक्ति या बड़े अधिकारी को सुझाव देना। जब आप सुझाव देवें, तो पहले यह अवश्य देख लें, कि आप किसे सुझाव दे रहे हैं? जिस व्यक्ति को आप सुझाव देना चाहते हैं, यदि वह व्यक्ति आप से अधिक विद्वान है, अधिक अनुभवी है, या बड़ा अधिकारी है, तो उसे आप सुझाव न दें। प्राय: लोग ऐसी गलती करते हैं। यदि कोई रोगी व्यक्ति किसी ऊंचे अनुभवी डॉक्टर साहब को चिकित्सा के मामले में सुझाव देवे, तो क्या यह उचित है? क्या कोई पुलिस कांस्टेबल, डीएसपी साहब को या आईजी साहब को पुलिस सुरक्षा संबंधी सुझाव दे सकता है? क्या कोई चपरासी, बैंक के मैनेजर को अकाउंट्स लिखने के मामले में सुझाव दे सकता है? यदि नहीं। तो सब लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। तीसरी गलती -- बिना प्रमाण तर्क के सुझाव देना। जब लोग किसी विषय में कुछ खास जानते नहीं, उस विषय का उन्होंने अध्ययन नहीं किया, कोई विशेष अनुभव भी नहीं है, ऐसे अनेक क्षेत्रों में भी हमने देखा है, कि लोग बिना प्रमाण के, बिना तर्क के, यूं ही अपनी डेढ़ अक्ल लगाते रहते हैं। और बिना सिर पैर के, उल्टे-सीधे सुझाव देते रहते हैं। रोज ही अनेक मैसेज आप whatsapp आदि पर देखते होंगे, जिनमें यह लिखा रहता है कि इस नुस्खे से आपका यह रोग दूर हो जाएगा। अब न तो मैसेज भेजने वाले का चिकित्सा विज्ञान में कोई अनुभव है, न वह डिग्री प्राप्त प्रशिक्षित चिकित्सक है। सिर्फ मैसेज फॉरवर्ड करके अपना नाम कमाना चाहता है, यह उचित नहीं है। इस प्रकार के मैसेज या अनुभव हीन सुझावों से लाभ तो कुछ होता नहीं, बल्कि सुझाव सुनने वाले का क्रोध और अधिक बढ़ जाता है। तो इस तीसरी गलती से भी बचना चाहिए। एक और उदाहरण -- एक बिजली का कारीगर बिजली ठीक कर रहा था। तो किसी अनाड़ी व्यक्ति ने बिना सोचे समझे उसे सुझाव देने शुरू कर दिए। उस कारीगर को और अधिक गुस्सा आया। वह मन ही मन में सोचने लगा कि इस मूर्ख को बिजली का कुछ पता तो है नहीं। और यह मुझे बिना सिर पैर के सुझाव दे रहा है। कितना मूर्ख है यह। तो इस प्रकार से सोचना चाहिए। यदि आप किसी विषय में किसी व्यक्ति को सुझाव दे रहे हैं, और उस विषय में आपके पास कोई प्रमाण तर्क है नहीं, कोई अनुभव है नहीं, तो उस विषय में सुझाव नहीं देना चाहिए। बल्कि मौन रहकर उस कार्य को सीखना चाहिए। बिना सीखे, बिना सोचे समझे किसी को भी, कुछ भी सुझाव नहीं देना चाहिए। परंतु आप भी ऐसा अनुभव करते होंगे कि, लोग इन तीनों गलतियों को करते रहते हैं, रुकते ही नहीं। स्वयं पर संयम नहीं रखते और बिना सोचे समझे, किसी को भी, बिना प्रमाण तर्क का कुछ भी सुझाव देते ही रहते हैं। कृपया इस खुजली या बीमारी से बचने का प्रयास करें। दूसरों की दृष्टि में मूर्ख न कहलाएं। व्यर्थ में अपनी खिल्ली न उड़वाएं। ऐसे बेढ़ंगे सुझाव देने पर यदि किसी दिन, किसी ने आपको डांट दिया, तब आप को बहुत कष्ट होगा। - स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक Intercast Marriage , The Vivah Sanskar will be solemnised, 16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777
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17.10.2020 संसार में सुख दुख तो आते रहते हैं। इसका नाम ही तो संसार है। सुख में सुखी न हों, दुख में दुखी न हों। इसी में जीवन की सफलता है। महर्षि कपिल जी ने सांख्यदर्शन में बताया है कि संसार उसे कहते हैं जहां हर समय राग द्वेष का व्यवहार चलता ही रहता है। कहीं शरीर में, कहीं वाणी में, और कहीं मन में। यदि वाणी और शरीर से राग द्वेष का व्यवहार रुक भी जाए, तो भी मन में तो चलता ही रहता है। जिस व्यक्ति ने संसार में जन्म लिया है, वह अनेक सुख भी भोगता और दुखों से भी पीड़ित होता है। और जब जीवन में सुख दुख आते हैं, तो राग द्वेष होना स्वाभाविक है। उस राग द्वेष से फिर आगे अच्छे बुरे कर्म होते हैं। और उन कर्मों से फिर अगला जन्म तथा फिर से सुख-दुख मिलता है। इस प्रकार से यह चक्र लगातार चलता ही रहता है। सुख-दुख, राग द्वेष, शुभ कर्म अशुभ कर्म, इन छह चीजों का चक्र हमेशा से चल रहा है, और आगे भी अनंत काल तक चलता रहेगा। इसी चक्र का नाम संसार चक्र है। क्या इस चक्र से छूटने का कोई उपाय है? जी हां। मोक्ष प्राप्ति एक उपाय है। कोई व्यक्ति यदि मोक्ष प्राप्त कर लेवे, तो इन 6 वस्तुओं के चक्र से बाहर निकल जाएगा। जन्म मरण चक्र से भी छूट जाएगा। इन दोनों चक्रों से जब छूट जाएगा, इसी का नाम मोक्ष है। मोक्ष में आत्मा सब प्रकार के दुखों से रहित हो जाता है, और ईश्वर के आनंद को बहुत लंबे समय तक भोगता है। जब तक मोक्ष नहीं होता, तब तक संसार में रहना होगा। और संसार में रहते हुए जब जब ये सुख दुख, राग द्वेष की परिस्थितियां आएंगी, इनसे युद्ध करना होगा। जो व्यक्ति इनसे युद्ध करके जीत जाएगा, वही इस चक्र से पार हो पाएगा, छूट पाएगा। प्रश्न -- तो इनसे कैसे युद्ध किया जाए? उत्तर -- जब सुख आए तो बहुत उछलना नहीं, कूदना नहीं, नाचना नहीं, बहुत खुशी नहीं मनाना। उसे सामान्य रूप से निभा लेना। इसी प्रकार से जब दुख आए, तब दुखी परेशान चिंतित नहीं होना। ऐसी स्थितियों में यह सोचना चाहिए, कि यह तो संसार है, सुख आता है, चला जाता है। दुख भी आया है, यह भी चला जाएगा। न तो सुख सदा हमारे साथ रहता है, न ही यह दुख सदा हमारे साथ रहेगा। इस प्रकार का चिंतन करके सुख-दुख को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार से इन सुख दुख, राग द्वेष आदि शत्रुओं से युद्ध करना चाहिए। यह कठिन कार्य है। यदि व्यक्ति ईमानदारी से पुरुषार्थ करे, तो धीरे-धीरे चिंतन करते-करते वह लंबे समय में, ऊपर बताई विधि के अनुसार, ऐसा युद्ध करने में समर्थ हो जाएगा, और वह इस युद्ध में जीत भी जाएगा। तो सार यह हुआ कि, इस प्रकार से जीवन में किसी भी घटना के होने पर, अधिक प्रसन्न भी न होवें, और दुखी परेशान चिंतित भी न होवें। अपने मन की स्थिति को नियंत्रित रखें। ईश्वर की उपासना करें, विशेष रूप से दुःख की घटनाओं में। ईश्वर से आपको बहुत शक्ति मिलेगी, और आप इस कार्य में सफल हो जाएंगे। - स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक Intercast Marriage , The Vivah Sanskar will be solemnised, 16sanskaro ke liye smpark kre 9977987777
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प्रश्न (17) ईश्वर आनन्द स्वरूप है - कैसे कह सकते हैं ? आनन्द की अनुभूति किसको होती है ? उत्तर - आनन्द की अनुभूति आत्मा को होती है । इन्द्रियों से जो तृप्ति होती है उसको सुख कहते हैं । जो इन्द्रियों को अच्छा लगता है उसको सुख कहते हैं ; जो आत्मा को अच्छा लगता है वह आनन्द है । सुख शरीर को मिलता है । आनन्द आत्मा की भूख है जो आनन्द की अनुभूति से मिटती है । प्रकृति से जो सुख मिलता है उसमें कहीं न कहीं दुःख मिश्रित होता है । अतिसुख अंत में दुःख का कारण बन जाता है, परन्तु आनंद में जब आत्मा डूबता है तो डूबता ही चला जाता है । उस आनन्द का वर्णन किसी भी भाषा में करना असंभव है । जैसे सुख का उल्टा दुःख होता है, वैसे आनंद का उल्टा शब्द कोई नहीं होता । आनन्द का लुफ्त (आनन्द) आत्मा को अनादि काल से अनेक बार मिला है, तभी तो वह हर योनि में उसे तलाशता रहता है और हर सम्भव प्रयत्न करता है । सांसारिक सुख मिलने पर भी वह नाखुश रहता है । वह क्या वस्तु है जिसे वह हर जन्म में ढूंढता रहता है ? आनन्द - केवल आनन्द ! ईश्वर के पास आनन्द का अनन्त खजाना है । ईश्वर पूर्ण है और उसे लुटाता रहता है । जो लूट सके उसे मिलता है । कैसे ? इसे समझना होगा । जो वस्तु जिसके पास होती है या जहाँ होती है, उसके पास रहने वाले को उसकी प्राप्ति होती है । ईश्वर के पास केवल आनन्द ही आनन्द है "स्व१र्यस्य च केवलम्" (अथर्ववेद-१०.८.१), अतः उसके समीप जो होता है वह आनन्दित होता है, जैसे : अग्नि से समीप बैठेंगे तो ही तपिश का अनुभव होता है, शरीर में गर्मी आती है, उसी प्रकार बर्फ के पास बैठने से ठण्डक मिलती है । ईश्वर की उपासना से जो वस्तु (गुण) ईश्वर के पास है वही प्राप्त होती है अर्थात् आनन्द के भण्डार से आनन्द ही प्राप्त होता है । जड़ प्रकृति के सम्पर्क से जड़ता का प्रभाव पड़ता है और चेतन के संस्पर्श से उसके गुण-कर्म-स्वभाव का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है । जीव और ईश्वर दोनों चेतन सत्ता हैं । जीव अल्पज्ञ है, ईश्वर सर्वज्ञ है । जीव सत् - चित् है, आनन्द-रहित है ; परन्तु ईश्वर सत्-चित्-आनन्दस्वरूप है, अतः ईश्वर में आनन्द है - "स्व१र्यस्य च केवलम्" । यह वेदवाणी है कि ईश्वर में आनन्द ही आनन्द है । जो जीवात्मा उसके सम्पर्क में आता है वह भी आनन्दित हो जाता है । योग-साधना से समाधि-अवस्था में आनन्द का अनुभव हो जाता है यह प्रमाणित है । ऋषि-मुनि-आप्तपुरुषों के वाक्यों को भी प्रमाण में लाया जा सकता है, अतः ईश्वर में आनन्द है । वह सब सद्गुणों-सद्कर्मों-सद्स्वभावों का भण्डार है, अतः आनन्दानुभव जो आत्मा की भूख है, वह उस पूर्ण ईश्वर के संस्पर्श (उपासना) से ही सम्भव है क्योंकि 'मन्द्र:' (ऋग्वेद ४.९.३) अर्थात् ईश्वर आनन्दस्वरूप है ।
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ओ३म् “यज्ञमय शाकाहार युक्त वैदिक जीवन ही सर्वोत्तम जीवन है” =================== वेद सृष्टि के प्राचीनतम ग्र्रन्थ हैं। वेदों के अध्ययन से ही मनुष्यों को धर्म व अधर्म का ज्ञान होता है जो आज भी प्रासंगिक एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वर्तमान में संसार में जो मत-मतान्तर प्रचलित हैं वह सब भी वेद की कुछ शिक्षाओं से युक्त हैं। उनमें जो अविद्यायुक्त कथन व मान्यतायें हैं वह उनकी अपनी हैं। वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। यह ज्ञान ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को दिया था। ईश्वर एक सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, नित्य, अविनाशी तथा अमर सत्ता है। इस सृष्टि की रचना भी परमात्मा ने ही की है और इसका पालन भी सर्वव्यापक तथा सब जीवों व प्राणियों का पिता सर्वेश्वर ही कर रहा है। सर्वज्ञ व सर्वव्यापक होने से परमात्मा इस संसार, ब्रह्माण्ड वा विश्व के बारे में सब कुछ जानता है। मनुष्य कितना भी ज्ञान प्राप्त कर लें, यहां तक की उपासना आदि से ईश्वर का साक्षात्कार भी कर लंे, परन्तु वह परमात्मा के समान ज्ञानवान नहीं हो सकते। ईश्वर प्रदत्त वेदज्ञान का अध्ययन करने पर उसमें ईश्वर की सर्वज्ञता का बोध व दर्शन होते हैं। वेदों का अध्ययन कर ही हमारे ऋषियों ने एक मत होकर, सृष्टि के विगत 1.96 अरब वर्षों के इतिहास में, सभी मनुष्यों के पांच प्रमुख कर्तव्य बताये हैं जिन्हें वह पंचमहायज्ञ कहा जाता है। इन पंचमहायज्ञों के नाम हैं ईश्वरोपासना वा सन्ध्या, देवयज्ञ अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा बलिवैश्वदेवयज्ञ। इन पंचमहायज्ञों से युक्त होने के कारण ही वैदिक धर्म व संस्कृति यज्ञमयी संस्कृति कही जाती है। हमें यज्ञ शब्द के अर्थ का ज्ञान भी होना चाहिये। यज्ञ श्रेष्ठतम व सत्यज्ञान से युक्त कर्मों को कहते हैं। परोपकार व सुपात्रों को दान देना भी यज्ञ में सम्मिलित है। यज्ञ का एक अर्थ विद्वान चेतन देवों की पूजा व सत्कार करना होता है। चेतन देवों माता, पिता व विद्वानों सहित पृथिवी, अग्नि, वायु, जल, आकाश आदि जड़ देवों की पूजा अर्थात् इनका सत्कार व इनसे लाभ प्राप्त करना, संगतिकरण तथा दान देना भी होता है। अग्निहोत्र यज्ञ में देवपूजा, संगतिकरण तथा दान का अच्छा समावेश रहता है। यज्ञ में विद्वानों को आमंत्रित किया जाता है और उनसे सदुपदेश प्राप्त किया जाता है। यज्ञ में हम जो घृत तथा साकल्य की आहुतियां देते हैं उनसे जड़ देवताओं का सत्कार होता है तथा प्रकृति व पर्यावरण का सन्तुलन बना रहता है। अग्निहोत्र यज्ञ से वायु व जल आदि की शुद्धि, रोगकारी किटाणुओं का नाश तथा मनुष्य आदि प्राणी रोगों से रहित तथा स्वस्थ रहते हैं। यज्ञ में वेदमंत्रों से ईश्वर की उपासना की जाती है जिससे वेदमंत्रों के अर्थों के अनुरूप परमात्मा हमारी प्रार्थनाओं को हमारी पात्रता के अनुसार पूरी करते हैं। यज्ञ से सब कामनाओं की पूर्ति एवं स्वर्ग की प्राप्ति होनी कही जाती है जो विचार करने पर सत्य एवं व्यवहारिक प्रतीत होती है। यज्ञ की इन सब व अन्य विशेषताओं के कारण ही परमात्मा ने वेदों में यज्ञ करने की प्रेरणा की है जिसे जानकर हमारे प्राचीन व अर्वाचीन ऋषियों व विद्वानों ने देश देशान्तर में यज्ञों का प्रचार किया था। आज भी वैदिक धर्म और ऋषि दयानन्द के अनुयायी आर्यसमाज संगठन से जुड़े बन्धु यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं तथा यज्ञ से होने वाले लाभों को प्राप्त करते हैं। यज्ञ करने से मनुष्य रोगरहित तथा स्वस्थ एवं अभावों से रहित हो जाते हंै। यज्ञकर्ता सुखी एवं ज्ञान विज्ञान सहित होकर सामाजिक जीवन में भी उन्नति को प्राप्त करते हैं। परमात्मा ने यह सृष्टि अपनी सनातन व शाश्वत जीवात्मारूपी प्रजा के लिये ही बनाई है। हम संसार में सुखों का भोग करते हैं जिसका आधार परमात्मा व उसकी सृष्टि ही है। हमारा शरीर भी हमें परमात्मा से ही प्राप्त होता है। सभी प्रकार के अन्न व भोजन आदि भी हमें परमात्मा द्वारा बनाये चराचर जगत से ही प्राप्त होते हैं। अतः हमारा कर्तव्य होता है कि हम ईश्वर का ध्यान करें, उसे जानें, वेदाध्ययन करें, वेद में प्रस्तुत ईश्वर के सत्य स्वरूप को जानकर उसकी उपासना करें और सदा उसके कृतज्ञ बने रहे। ईश्वर का ध्यान करने से मनुष्य को अनेक लाभ होते हैं। उसकी आत्मा को ज्ञान प्राप्त होता है व उसमें उत्तरोत्र वृद्धि होती है, बल की प्राप्ति होती है, सद्प्रेरणायें मिलती हंै तथा ईश्वर उपासकों की रक्षा करता है। ईश्वर की उपासना से मनुष्य दुःखों से छूटकर सुखों को प्राप्त होते हैं। ऐसे अनेकानेक लाभ ईश्वर का सत्यज्ञान प्राप्त कर उसकी उपासना करने से होते हैं। ईश्वर ने ही हमें यह श्रेष्ठ मानव शरीर दिया है। वही हमें परजन्मों में भी हमारे कर्मों के अनुसार जन्म, जीवन व आत्मा को सुख प्रदान करने वाले शरीर आदि देगा। यह क्रम अनन्त काल तक चलना है और हम अनादि व अमर होने के कारण ईश्वर से अनन्त काल तक वर्तमान जीवन के समान लाभान्वित होंगे। ईश्वर के जीवात्माओं पर इतने अधिक उपकार हैं कि कोई भी मनुष्य ईश्वर के उपकारों की गणना नहीं कर सकता। अतः ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होकर उसका ध्यान व उपासना करना तथा सभी प्रकार के अज्ञान, अन्धविश्वासों व पाखण्डों से दूर रहना हम सब मनुष्यों का कर्तव्य होता है। हमें सावधान रहकर अपने कर्तव्यों को जानकर उनका पालन करना चाहिये। ऐसा करने से ही हम ईश्वर की सत्य उपासना करते हैं और इससे हमें जीवन में ज्ञान, सुख, धन, सम्पत्ति, जीवनोन्नति तथा ईश्वर साक्षात्कार आदि ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है। यही सब ऐश्वर्य मनुष्य के लिये जीवन में प्राप्तव्य होते हैं। मनुष्य को ईश्वर उपासना सहित अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ एवं बलिवैश्वदेव यज्ञ का भी नित्य प्रति सेवन करना चाहियें। इसके लिये हमें सत्यार्थप्रकाश, पवंचमहायज्ञविधि, संस्कारविधि आदि ग्रन्थों को पढ़ना चाहिये जिससे हमें पंचमहायज्ञों तथा यज्ञमय जीवन पद्धति का परिचय व ज्ञान हो सकेगा। परमात्मा ने मनुष्य को दूसरे प्राणियों पर उपकार करने के लिये बनाया है। हमें ध्यान रखना होता है कि हमारे किसी कर्म से किसी भी प्राणी को अकारण पीड़ा न हो। अहिंसा का अर्थ भी वैर त्याग तथा दूसरे प्राणियों को अपने समान समझकर उरसे प्रेम व सत्कार का व्यवहार करने से पूरा व सिद्ध होता है। शाकाहार से किसी प्राणी को पीड़ा नहीं होती जबकि मांसाहार करने से जिन प्राणियों के मांस का भक्षण किया जाता है, उन्हें अकारण असहनीय पीड़ा होती है। वेदों में मांस भक्षण का विधान कहीं नहीं है। वेद विरुद्ध व्यवहार व कार्य सब मनुष्यों के लिए अकर्तव्य होते हैं। ज्ञान व विज्ञान के अनुरूप मनुष्य के स्वस्थ जीवन के लिए शाकाहार ही उत्तम भोजन होता है। शाकाहारी प्राणियों का जीवन मांसाहारी प्राणियों की तुलना में अधिक लम्बा होता है। हाथी व अश्व आदि बलशाली प्राणी शाकाहारी ही होते हैं। मांसाहार से अनेक रोगों की सम्भावना होती है। मांसाहार ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध अकर्तव्य एवं पापकर्म होता है जिसका फल मनुष्य को परमात्मा की न्याय व्यवस्था से जन्म जन्मान्तरों में भोगना पड़ता है। हमारे महापुरुष श्री राम, श्री कृष्ण तथा ऋषि दयानन्द जी शाकाहारी थे तथा अपूर्व ज्ञान व बल से सम्पन्न थे। हनुमान तथा भीष्म पितामह भी अतुल बलशाली थे और भोजन की दृष्टि से शाकाहारी ही थे। अतः मनुष्यों को मांसाहार का त्यागकर शाकाहार को ही अपनाना चाहिये। यही जीवन सुख व उन्नति का आधार होता है। यदि हम अपने जीवन को यज्ञमय व शाकाहार से युक्त रखेंगे तो निश्चय ही हमारा कल्याण होगा। इसी कारण से हमें सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना चाहिये। अपने सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य का विचार करके करने चाहियें। ऐसा करेंगे तो निश्चय ही हमें मांसाहार का त्याग करना होगा और शाकाहार को अपनाना होगा। हमें सत्य मार्ग वेदपथ पर चल कर अपने जीवन को उन्नत व इसके प्रयोजन मोक्ष प्राप्ति को सिद्ध करने वाला बनाना चाहिये। इसी लिये परमात्मा ने इस सृष्टि को बनाकर आरम्भ में ही मनुष्यों को वेदज्ञान दिया था। वेद अध्ययन व अध्यापन करने के ग्रन्थ हंै। हम इनका जितना अध्ययन करेंगे उतना ही अधिक लाभ प्राप्त करेंगे और यदि अध्ययन नहीं करेंगे तो ईश्वर की आज्ञा भंग करने वाले होंगे। अतः हमें वेदाध्ययन व वेदों का स्वाध्याय करते हुए अपने जीवन को यज्ञमय बनाकर तथा शाकाहारी भोजन करते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिये। यही जीवन पद्धति श्रेष्ठ व सर्वोत्तम है। हमें सर्वोत्तम को ही अपनाना व आचरण में लाना चाहिये। वेदों का अध्ययन व वेदों के अनुसार ही आचरण करना सब मनुष्यों का ईश्वर प्रदत्त धर्म व कर्तव्य है। हमें इसे जानना चाहिये और इसी को अपनाना चाहिये जिससे हमें सुखों की प्राप्ति होने सहित जन्म जन्मान्तरों में हमारा कल्याण हों। ओ३म् शम्। -मनमोहन कुमार आर्य
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