एक शुद्धधर्म होता है और दूसरा आपद्धर्म ।मनुष्यों क...

एक शुद्धधर्म होता है और दूसरा आपद्धर्म ।मनुष्यों के नियमविरुद्ध कार्यों के कारण जब अस्वाभाविक उत्पात उत्पन्न होते हैं तब वे शुद्धधर्म ( प्रवचन, उपदेश , यज्ञ आदि) के द्वारा रोके नहीं जा सकते । अनियमित रीति से उत्पन्न हुए उत्पात या उत्पातियों का सामना करने के लिए अनियमित सिद्धांतों की आवश्यकता होती है , इसी का नाम आपद्धर्म है । इसीलिए वर्ण व्यवस्था का निर्धारण किया गया है और इसकी तुलना शरीर से की गई है ।सिर ब्राह्मण, हाँथ क्षत्रिय, पेट वैश्य तथा पैर शूद्र माना गया है। आपत्ति रहित अवस्था में जिस प्रकार बिना हाँथ पैर का मनुष्य जी सकता है किन्तु आपत्ति के समय बिना हाँथ पैर के मनुष्य कोई काम नहीं कर सकता । उस समय केवल मस्तिष्क के द्वारा सम्पन्न होने वाले ज्ञान विज्ञान और योग समाधि, प्रवचन, उपदेश से समाज का काम नहीं चल सकता अतः आपद्धर्म का संरक्षक क्षत्रिय ही माना गया है.....
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