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ओ३म्🌷🌹15 अक्तूबर/जन्म-दिवस🌹🔮प्रेरक व्यक्तित्व महात्मा आनन्द स्वामी🔮आर्य समाज के वरिष्ठ नेता महात्मा आनन्द स्वामी का जन्म 15 अक्तूबर, 1883 को हुआ था। उनके पिता मुंशी गणेश दास हिन्दू समाज की कुरीतियों से दुखी होकर ईसाई बनने जा रहे थे; पर तभी उनकी भेंट महर्षि दयानन्द सरस्वती से हो गयी। उन्होंने मुंशी जी को बताया कि ये कुरीतियाँ सनातन हिन्दू धर्म का अंग नहीं है। देश, काल परिस्थिति के कारण कुछ लोग या समूह अज्ञानवश इन्हें अपनाते हैं। अतः ईसाई बनने के बदले उन्हें हिन्दू समाज की कुरीतियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।मुंशी जी की आँखें खुल गयीं। अब वे महर्षि दयानन्द सरस्वती और आर्यसमाज के भक्त बन गये। इनके घर में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम खुशहाल चन्द रखा गया; पर जैसे-जैसे बालक बड़ा हुआ, तो सबके ध्यान में आया कि यह बालक मन्दबुद्धि है। यह देखकर स्वामी नित्यानन्द ने बालक को गायत्री की साधना करने को कहा। इससे खुशहाल चन्द की बुद्धि जाग्रत हो गयी और उसका जीवन बदल गया।कुछ समय बाद खुशहाल का विवाह और एक सन्तान हुई। अब मुंशी जी उसे व्यापार में लगाना चाहते थे; पर उसका मन तो अब पढ़ने-लिखने में ही अधिक लगता था। एक बार आर्य समाज जलालपुर के वार्षिकोत्सव में महात्मा हंसराज जी आये। खुशहाल ने उनके भाषण की रिपोर्ट बनाकर उन्हें दिखाई, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने खुशहाल को लाहौर आने को कहा।लाहौर में हंसराज जी ने खुशहाल को ‘आर्य गजट’ के सम्पादक श्री रामप्रसाद जी के पास लेखन कला के अभ्यास को भेजा; पर रामप्रसाद जी ने उन्हें लेखा विभाग में लगा दिया। उन्हें 30 रु. वेतन मिलता था, जिसमें से काफी धन कार्यालय के हिसाब की पूर्ति में लग जाता था। शेष से उनका पेट ही नहीं भरता था। जब हंसराज जी को यह पता लगा, तो उन्होंने खुशहाल को आर्य गजट का सह सम्पादक बनवा दिया। अब तो वे दिन-रात काम में लगे रहते। इससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। यह देखकर उनकी पत्नी मेलादेवी भी लाहौर आ गयी। अब खर्च और बढ़ गया, जबकि आय सीमित थी।एक बार मेलादेवी ने अपने मायके से 15 रु. मँगा लिये। जब खुशहाल जी को यह पता लगा, तो उन्होंने कहा कि पैसे तो मैं भी मँगा सकता था; पर इससे मेरी तपस्या भंग हो जाती। इसके बाद मेलादेवी ने घोर कष्टों में भी ससुराल या मायके से पैसे मँगाने की बात नहीं की। जब ‘दैनिक मिलाप’ का प्रकाशन शुरू हुआ, तो खुशहाल चन्द को उसके काम में लगा दिया गया।एक बार घी समाप्त होने पर मेलादेवी ने अपने पुत्र को उनके पास भेजा। तभी खुशहाल जी को मिलाप के लिए अनेक धनादेश मिले थे; पर उन्होेंने उसे घी के लिए खर्च करने से मना कर दिया। संन्यास के बाद उनका नाम आनन्द स्वामी हो गया। दिल्ली आने पर वे अपने पुत्र के घर न जाकर आर्य समाज भवन में ही ठहरते थे। एक बार बेटा उन्हें लेने आया, तो वे किसी के घर से माँगी हुई रोटी खा रहे हैं। बेटे के नाराज होने पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि संन्यासी को भिक्षावृत्ति से ही पेट भरना चाहिए।विरक्त सन्त महात्मा आनन्द स्वामी का जीवन उस प्रकाश स्तम्भ की भाँति है, जिसके प्रकाश में हम कभी भी अपने जीवन का मार्ग निर्धारित कर सकते
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ओ३म्🌷🌹15 अक्तूबर/जन्म-दिवस🌹🔮प्रेरक व्यक्तित्व महात्मा आनन्द स्वामी🔮आर्य समाज के वरिष्ठ नेता महात्मा आनन्द स्वामी का जन्म 15 अक्तूबर, 1883 को हुआ था। उनके पिता मुंशी गणेश दास हिन्दू समाज की कुरीतियों से दुखी होकर ईसाई बनने जा रहे थे; पर तभी उनकी भेंट महर्षि दयानन्द सरस्वती से हो गयी। उन्होंने मुंशी जी को बताया कि ये कुरीतियाँ सनातन हिन्दू धर्म का अंग नहीं है। देश, काल परिस्थिति के कारण कुछ लोग या समूह अज्ञानवश इन्हें अपनाते हैं। अतः ईसाई बनने के बदले उन्हें हिन्दू समाज की कुरीतियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।मुंशी जी की आँखें खुल गयीं। अब वे महर्षि दयानन्द सरस्वती और आर्यसमाज के भक्त बन गये। इनके घर में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम खुशहाल चन्द रखा गया; पर जैसे-जैसे बालक बड़ा हुआ, तो सबके ध्यान में आया कि यह बालक मन्दबुद्धि है। यह देखकर स्वामी नित्यानन्द ने बालक को गायत्री की साधना करने को कहा। इससे खुशहाल चन्द की बुद्धि जाग्रत हो गयी और उसका जीवन बदल गया।कुछ समय बाद खुशहाल का विवाह और एक सन्तान हुई। अब मुंशी जी उसे व्यापार में लगाना चाहते थे; पर उसका मन तो अब पढ़ने-लिखने में ही अधिक लगता था। एक बार आर्य समाज जलालपुर के वार्षिकोत्सव में महात्मा हंसराज जी आये। खुशहाल ने उनके भाषण की रिपोर्ट बनाकर उन्हें दिखाई, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने खुशहाल को लाहौर आने को कहा।लाहौर में हंसराज जी ने खुशहाल को ‘आर्य गजट’ के सम्पादक श्री रामप्रसाद जी के पास लेखन कला के अभ्यास को भेजा; पर रामप्रसाद जी ने उन्हें लेखा विभाग में लगा दिया। उन्हें 30 रु. वेतन मिलता था, जिसमें से काफी धन कार्यालय के हिसाब की पूर्ति में लग जाता था। शेष से उनका पेट ही नहीं भरता था। जब हंसराज जी को यह पता लगा, तो उन्होंने खुशहाल को आर्य गजट का सह सम्पादक बनवा दिया। अब तो वे दिन-रात काम में लगे रहते। इससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। यह देखकर उनकी पत्नी मेलादेवी भी लाहौर आ गयी। अब खर्च और बढ़ गया, जबकि आय सीमित थी।एक बार मेलादेवी ने अपने मायके से 15 रु. मँगा लिये। जब खुशहाल जी को यह पता लगा, तो उन्होंने कहा कि पैसे तो मैं भी मँगा सकता था; पर इससे मेरी तपस्या भंग हो जाती। इसके बाद मेलादेवी ने घोर कष्टों में भी ससुराल या मायके से पैसे मँगाने की बात नहीं की। जब ‘दैनिक मिलाप’ का प्रकाशन शुरू हुआ, तो खुशहाल चन्द को उसके काम में लगा दिया गया।एक बार घी समाप्त होने पर मेलादेवी ने अपने पुत्र को उनके पास भेजा। तभी खुशहाल जी को मिलाप के लिए अनेक धनादेश मिले थे; पर उन्होेंने उसे घी के लिए खर्च करने से मना कर दिया। संन्यास के बाद उनका नाम आनन्द स्वामी हो गया। दिल्ली आने पर वे अपने पुत्र के घर न जाकर आर्य समाज भवन में ही ठहरते थे। एक बार बेटा उन्हें लेने आया, तो वे किसी के घर से माँगी हुई रोटी खा रहे हैं। बेटे के नाराज होने पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि संन्यासी को भिक्षावृत्ति से ही पेट भरना चाहिए।विरक्त सन्त महात्मा आनन्द स्वामी का जीवन उस प्रकाश स्तम्भ की भाँति है, जिसके प्रकाश में हम कभी भी अपने जीवन का मार्ग निर्धारित कर सकते
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#पंडितगुरुदत्तविद्यार्थी (२६ अप्रैल १८६४ - १८९०), महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनन्य शिष्य एवं कालान्तर में आर्यसमाज के प्रमुख नेता थे। उनकी गिनती आर्य समाज के पाँच प्रमुख नेताओं में होती है। २६ वर्ष की अल्पायु में ही उनका देहान्त हो गया किन्तु उतने ही समय में उन्होने अपनी विद्वता की छाप छोड़ी और अनेकानेक विद्वतापूर्ण ग्रन्थों की रचना की।#जीवनीअद्भुत प्रतिभा, अपूर्व विद्वत्ता एवं गम्भीर वक्तृत्व-कला के धनी पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी का जन्म 26 अप्रैल 1864 को मुल्तान के प्रसिद्ध 'वीर सरदाना' कुल में हुआ था।[1] आपके पिता लाला रामकृष्ण फारसी के विद्वान थे। आप पंजाब के शिक्षा विभाग में झंग में अध्यापक थे।विशिष्ट मेधा एवं सीखने की उत्कट लगन के कारण वे अपने साथियों में बिल्कुल अनूठे थे। किशोरावस्था में ही उनका हिन्दी, उर्दू, अरबी एवं फारसी पर अच्छा अधिकार हो गया था तथा उसी समय उन्होंने 'द बाइबिल इन इण्डिया' तथा 'ग्रीस इन इण्डिया' जैसे बड़े-बड़े ग्रन्थ पढ़ लिये। कॉलेज के द्वितीय वर्ष तक उन्होंने चार्ल्स ब्रेडले, जेरेमी बेन्थम, जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे पाश्चात्त्य विचारकों के शतशः ग्रन्थ पढ़ लिये। वे मार्च, 1886 में पंजाब विश्वविद्यालय की एम ए (विज्ञान, नेचुरल साईन्स) में सर्वप्रथम रहे। तत्कालीन महान समाज सुधरक महर्षि दयानन्द के कार्यों से प्रभावित होकर उन्होंने 20 जून 1880 को आर्यसमाज की सदस्यता ग्रहण की। महात्मा हंसराज व लाला लाजपत राय उनके सहाध्यायी तथा मित्र थे। वे ‘द रिजेनरेटर ऑफ आर्यावर्त’ के वे सम्पादक रहे।1884 में उन्होने ‘आर्यसमाज साईन्स इन्स्टीट्यूशन’ की स्थापना की। अपने स्वतन्त्र चिन्तन के कारण इनके अन्तर्मन में नास्तिकता का भाव जागृत हो गया। दीपावली (1883) के दिन, महाप्रयाण का आलिंगन करते हुए महर्षि दयानन्द के अन्तिम दर्शन ने गुरुदत्त की विचारधरा को पूर्णतः बदल दिया। अब वे पूर्ण आस्तिक एवं भारतीय संस्कृति एवं परम्परा के प्रबल समर्थक एवं उन्नायक बन गए। वे डीएवी के मन्त्रदाता एवं सूत्रधार थे। पूरे भारत में साईन्स के सीनियर प्रोफेसर नियुक्त होने वाले वह प्रथम भारतीय थे। वे गम्भीर वक्ता थे, जिन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी। उन्होंने कई गम्भीर ग्रन्थ लिखे, उपनिषदों का अनुवाद किया। उनका सारा कार्य अंग्रेजी में था। उनकी पुस्तक ‘द टर्मिनॉलॅजि ऑफ वेदास्’ को आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की पाठ्यपुस्तक के रूप में स्वीकृत किया गया। उनके जीवन में उच्च आचरण, आध्यात्मिकता, विद्वत्ता व ईश्वरभक्ति का अद्भुत समन्वय था। उन्हें वेद और संस्कृत से इतना प्यार था कि वे प्रायः कहते थे कि - "कितना अच्छा हो यदि मैं समस्त विदेशी शिक्षा को पूर्णतया भूल जाऊँ तथा केवल विशुद्ध संस्कृतज्ञ बन सकूँ।" ‘वैदिक मैगजीन’ के नाम से निकाले उनके रिसर्च जर्नल की ख्याति देश-विदेश में फैल गई। यदि वे दस वर्ष भी और जीवित रहते तो भारतीय संस्कृति का बौद्धिक साम्राज्य खड़ा कर देते। पर, विधि के विधान स्वरूप उन्होंने 19 मार्च 1890 को चिरयात्रा की तरफ प्रस्थान कर लिया। पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ ने 2000 ई में उनके सम्मान में अपने रसायन विभाग के भवन का नाम ‘पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी हाल’ रखा है। आज सनातन धर्म के अत्यन्त पुरूषार्थी, समर्पित और बलिदानी व्यक्ति"पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी" की पुण्यतिथि है। arya samaj indore |love marriage |inter cast marriage
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आज का पंचांग ।🕉🙏 नमस्ते जी 🙏🕉🌹आपका दिन शुभ हो 🌹^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ 11 अक्टूबर 2019 ~~~~~~~~~~~~दिन ----- शुक्रवारतिथि --- त्रयोदशीनक्षत्र ---- पूर्वा भाद्रपदपक्ष ------ शुक्लमाह-- --- आश्विनऋतु -------- शरदसूर्य दक्षिणायणे, दक्षिण गोले विक्रम सम्वत --2076दयानंदाब्द -- 195शक सम्बत -- (सप्तम)सृष्टि सम्वत--1960853120🍎 पहला सुख निरोगी काया लेटकर या खड़े होकर पानी न पिएँ, सदैव बैठकर पिएँ। 🌹आज का विचार ब्रेक और एक्सीलेटर परस्पर विरोधी नहीं किन्तु गाड़ी को चलाने में सहयोगी हैं , अनिवार्य हैं! वैसे ही दण्ड व पुरस्कार, निन्दा व प्रशंसा जीवन रूपी गाड़ी को अच्छे से चलानें में सहयोगी व आवश्यक हैं! आचार्य भानु प्रताप वेदालंकार इन्दौर मध्यप्रदेश 9977987777, 9977957777 🌹🌹🌹🌹🙏🌹🌹🌹🌹🏵 हिन्दी संकल्प पाठ 🏵हे परमात्मन् आपको नमन!!आपकी कृपा से मैं आज एक यज्ञ कर्म को तत्पर हूँ, आज एक ब्रह्म दिवस के दूसरे प्रहर कि जिसमें वैवस्वत मन्वन्तर वर्तमान है, अट्ठाईसवीं चतुर्युगी का कलियुग जिसका प्रथम चरण वर्तमान है, कि जिसका काल अब 5121वर्ष चल रहा है , सृष्टिसम्वत्सर एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ बीसवां वर्ष है, विक्रम सम्बत् दो हजार छियत्तर है, दयानंदाब्द 195वां है सूर्य दक्षिण अयन में दक्षिण गोल में वर्तमान है , कि ऋतु शरद , मास आश्विन का शुक्ल पक्ष तिथि त्रयोदशी नक्षत्र - पूर्वा भाद्रपद , दिन आज शुक्रवार है , अंग्रेजी तारीख 11 अक्टूबर को भरतखण्ड के आर्यावर्त देश के अंतर्गत, ..प्रदेश के ....जनपद...के ..ग्राम/शहर...में स्थित (निज घर में, या आर्यसमाज मंदिर में) मैं ...अमुक गोत्र में उत्पन्न, पितामह श्री ....(नाम लें ).के सुपुत्र श्री .(पिता का नाम लें)उनका पुत्र मैं ...आज सुख , शान्ति , समृद्धि के लिए तथा आत्मकल्याण के लिए प्रातः वेला में यज्ञ का संकल्प लेता हूँ, जिसके निर्देशक /ब्रह्मा के रूप में आप आचार्य..... श्री का वरण करता हूँ!कृपा कर यज्ञ सम्पन्न कराइए🙏 🕉 आज का संकल्प पाठ 🕉 ओं तत्सद्।श्री व्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे , {एक वृन्दषण्णनवतिकोट्याष्टलक्षत्रिपञ्चासत्सहस्र विंश अधिक शततमे मानव सृष्टिसम्वत्सरे}, १९६०८५३१२० सृष्टि सम्वतसरे, २०७६ {षटसप्ततति: उत्तर द्वी सहस्रे वैक्रमाब }, शाके १९४१ दयानंदाब्द(पञ्च नवती उत्तर शततमे) १९५ , रवि दक्षिणायणे, दक्षिण गोले, शरद ऋतौ, आश्विन मासे शुक्ल पक्षे , त्रयोदशी तिथि, पूर्वा भाद्रपद नक्षत्रे शुक्रवासरे , तदनुसार ११ अक्टूबर २०१९ जम्बूद्वीपे, भरतखण्डेआर्यावर्तान्तर् गते .........प्रदेशे , ........जनपदे.. ..नगरे......गोत्रोत्पन्नः....श्रीमान.(पितामह)....(पिता..).पुत्रस्य... अहम् .'(स्वयं का नाम)....अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ , आत्मकल्याणार्थ , रोग -शोक निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे।🚩 आचार्य भानु प्रताप वेदालंकार 9977987777🙏🙏🙏🙏🙏🕉🙏🙏🙏🙏🙏
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ईश्वर की उपासना के लिए निश्चित मन्त्र एवं मन्त्र चयन ●---------------------- (स्मृतिशेष) आचार्य श्री ज्ञानेश्वरार्य:एक शंका प्रायः यह भी लोगों के मन में आती है कि जो स्वामी दयानन्द जी ने पंचमहायज्ञ विधि में, संस्कारविधि में जो-जो मंत्र लिखे हैं उन्हीं के माध्यम से ईश्वर ध्यान हो का सकता है अन्य किन्ही मंत्रों से ईश्वर का ध्यान नहीं हो सकता क्या यह सत्य है? इसके विषय में उत्तर ये है कि ऐसी बात नहीं है कि उन्हीं मंत्रों के माध्यम से ही ईश्वर का ध्यान हो सकता है। हम वेद के किसी अन्य मंत्र से भी ईश्वर की उपासना, ध्यान कर सकते हैं। इतनी बात अवश्य है कि उन मंत्रों के अंदर ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव का वर्णन होना चाहिए। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना विषय होने चाहिए। न केवल वेदमंत्र अपितु ऋषियों के बनाए ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों में जो श्लोक हैं उन श्लोकों के माध्यम से भी ईश्वर की उपासना कर सकते हैं। दर्शन आदि में ऋषियों द्वारा जो सूत्र बनाये हैं, उनके माध्यम से भी उपासना कर सकते हैं। ऋषियों ने ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव की व्याख्या करते हुए जिन वाक्यों की रचना की है, जो वेद मंत्रों के भाष्य किए हैं, सूत्रों के भाष्य किए हैं, उन भाष्यों के वाक्यों से भी ईश्वर की उपासना कर सकते हैं।अर्थात् हम किसी भी सामान्य शब्द से भी ईश्वर की प्रार्थना-उपासना कर सकते हैं शर्त एक है मंत्रों में, उन श्लोकों में, वाक्यों में, शब्दों में, ईश्वर के गुण-कर्म- स्वभाव का वर्णन आता हो। कोई भी मंत्र, कोई भी वाक्य, कोई भी सूत्र, कोई भी श्लोक ईश्वर कैसा है ? किस प्रकार के गुण वाला है ? किस प्रकार के कर्मों को करता है ? किस प्रकार के स्वभाव वाला है ? आदि विषयों को यदि बताता है तो उस मंत्र, सूत्र, श्लोक, वाक्य, शब्द से हम ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना कर सकते हैं।जो व्यक्ति मंत्र भी नहीं जानता है, श्लोक भी नहीं जानता है, सूत्र भी नहीं जानता है, संस्कृत भी नहीं जानता है, ऋषियों के वाक्यों को भी नहीं जानता है, कोई अच्छे संस्कृत का शब्द उसके पास नहीं हैं तो उसका भी उपाय है कि विद्वानों के, भक्तों के बनाए जो भजन, गीत हैं उन भजनों के माध्यम से भी ईश्वर का ध्यान कर सकता है। ध्यान के लिए एकाग्रता व समर्पण आवश्यक है। यदि हमारा समर्पण ईश्वर के प्रति है और हम एकाग्र है, उसके प्रति प्रेम है, तो ईश्वर का ध्यान भजन से भी कर सकते हैं और गीत से भी कर सकते हैं।उपासना हेतु मन्त्र चयनजिन मन्त्रों का चयन ऋषियों ने ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना के लिए किया है उन मन्त्रों में ईश्वर की उपासना कैसे करनी चाहिए ? क्या-क्या माँगना चाहिए? हमको क्या-क्या अपेक्षा है ? वो सारी बातें उन मंत्रों में निहित हैं। शरीर के विषय में, मन के विषय में, आत्मा के विषय में जो-जो हमारी अपेक्षाएं हैं। हमें क्या चाहिए ? ईश्वर क्या दे सकता है ? ये सारी बातें इन मंत्रों में सूत्र रूप में बताया गया है।ईश्वर कैसा है ? उसका गुण-कर्म-स्वभाव कैसा है ? हम कैसे ईश्वर को प्राप्त कर सकते है ? ईश्वर की उपासना करने से क्या लाभ होता है ? क्या महत्व, उपयोगिता है ? ईश्वर की उपासना से क्या हमारी प्रयोजन की सिद्धि होती है ? ये सारी बातें जितनी सूक्ष्मता से, सरलता से, संक्षेप से इन मंत्रों में बतायी गयी है उतनी और अन्य मंत्रों में नहीं मिलती हैं।इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह उन मंत्रों के से ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना करें। क्योंकि ऋषि लोग बुद्धिमान थे उन्होंने विशेष मंत्रों का चयन किया, ऐसे वैसे सामान्य मंत्रों को नहीं ले लिया। फिर भी प्रायः देखने में आता है एक ही एक प्रकार के मंत्रों का उच्चारण करने से व्यक्ति ऊब जाता है जैसे कि एक-एक प्रकार का भोजन करने से, एक-एक प्रकार के वस्त्र पहनने से व्यक्ति ऊब जाता है, ऐसे ही एक ही एक प्रकार के मंत्रों से भी ऊब जाता है। इसमें यह अवकाश है कि हम और भी अनेक अन्य प्रकार के मंत्रों को ले कर, जिसमें ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव अच्छी प्रकार से बताये गये हों और उन मन्त्रों में यह भी बताया गया हो कि उपासना के क्या लाभ क्या हैं? उन मंत्रों के माध्यम से भी ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना की जा सकती है, ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं है कि केवल संस्कार विधि या पंचमहायज्ञ पुस्तक में बताये गये मंत्रों से ही ईश्वर का ध्यान हो सकता है अन्य मंत्रों, सूत्रों, श्लोकों, वाक्यों या शब्दों से नहीं हो सकती।[स्रोत : निराकार ईश्वर की उपासना, पृ. 29-32, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]
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बजट क्या है, 2020-1-22 • priyanka • समाचारबजट क्या है, इसके प्रकार, उद्देश्य | Budget Definition, Type and AimPriyanka November 13, 2017 लेख, सामान्य ज्ञान Leave a comment बजट क्या है, इसके प्रकार, उद्देश्य | Budget Definition, Type and Aim in hindiबजट एक ऐसा शब्द है जोकि, आम जिंदगी मे बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कोई भी समझदार व्यक्ति अपने हर छोटे बड़े काम या कोई भी खर्चे या निवेश का बजट बना कर ही करता है. ठीक उसी तरह सरकार भी अपने मुख्य कार्य, आय-व्यय का लेखा-जोखा बजट से ही करती है. तथा हर वर्ष सरकार जनता के सामने अपना बजट प्रस्तुत करती है. बजट सरकार व प्रत्येक व्यक्ति की जिन्दगी का इतना महत्वपूर्ण हिस्सा है. जिसके लिये, भारत के संविधान (Constitution of India) मे अलग से अनुछेद बना कर विस्तारित भी किया गया है. आजाद भारत का सबसे पहला केन्द्रीय बजट छब्बीस नवम्बर, उन्नीस सौ सैतालिस (26/11/1947) को आर.के.शंमुखम के द्वारा संसद मे प्रस्तुत किया गया था.बजट की परिभाषासंविधान के अनुसार बजटबजट का उद्देश्यबजट के प्रकारबजट कैसे बनाया जाता है?बजट के सम्बन्ध मे महत्वपूर्ण बातेबजट की परिभाषा (Budget Definition) बजट, भविष्य के लिये की गई वह योजना है जो, पूरे साल की राजस्व व अन्य आय तथा खर्चो का अनुमान लगा कर बनाई जाती है. जिसमे वित्तीय मंत्री के द्वारा, सरकार के समक्ष अपनी व्यय का अनुमान लगा कर, आने वाले वर्ष के लिये कई योजनायें बना कर, जनता के सामने हर वित्तीय वर्ष के दौरान प्रस्तुत करती है. एक आदर्श बजट वह होता है जिसमे, किसी का स्वार्थ ना हो. सरकार द्वारा उस बजट मे लोग, व्यापार, सरकार, देश, बहुराष्ट्रीय संगठन के लिये, एक व्यक्ति, परिवार, समूह के लिये अच्छी से अच्छी योजनायें बनाई गई हो तथा खर्चे व निवेश किये गये हो.संविधान के अनुसार बजट संविधान के अनुछेद (Artical) 112 के अनुसार, राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के दौरान , संसद के दोनों सदनों के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण रखवाते है, जिसमे सरकार के गत वर्ष के आय/प्राप्तियों व व्ययों का ब्योरा होता है.बजट मे अनुमानित मुख्य रूप से दो मदों को लिखा जाता है –भारत सरकार की संचित निधि पर लगे व्यय.सरकार की संचित निधि के लिये किये जाने वाले अन्य व्ययों की भरपाई के लिये अपेक्षित राशि.इसके आलावा अन्य तथा राजस्व व्ययों का विवरण बजट मे देना होता है.बजट निर्माण के उद्देश्य (Aim of Budget in hindi)प्रत्येक वर्ष के लिये सरकार पूर्व मे ही योजना बना लेती है. जिसमे सरकार की आय के स्त्रोत जैसे- भिन्न-भिन्न करो की वसूली या टैक्स, राजस्व से आय, सरकारी फीस-जुर्मना, लाभांश, दिये गये ऋण पर ब्याज आदि सभी आय और इन आय को वापस जनता के लिये लगाना बजट का मुख्य उद्देश्य होता है. आर्थिक विकास की दर मे वृद्धि करना.गरीबी व बेरोजगारी को दूर करना.असमानताओ को दूर कर आय का सही योजनाओं मे उपयोग करना.बाजार मे मूल्य व आर्थिक स्थिरता बनाये रखना.अन्य सभी क्षेत्रों रेल, बिजली, वित्त, अनाज, खाद्यपदार्थ, बैंकों के लिये भी फण्ड रखना.बजट के प्रकार (Type of Budget)सामान्यतया सालाना बजट वित्त मंत्रालयों मे उनके बाटे गये विभाग द्वारा बनाये जाते है. जिसकी अंतिम मंजूरी राष्ट्रपति द्वारा दी जाती है जोकि, केन्द्र व राज्य सरकार दोनों के सम्बन्ध मे होती है. रेल बजट, रेल मंत्रालय द्वारा अलग से तैयार किया जाता है. बजट के मुख्य रूप से तो दो ही प्रकार होते है.केन्द्रीय बजटरेल बजटकेन्द्रीय बजट (Union Budget)केन्द्र सरकार द्वारा प्रस्तुत किया गया सबसे बड़ा बजट जो हर वर्ग के व्यक्ति को ध्यान मे रख कर बनाया जाता है. जिसे आम बजट भी कहा जाता है इसमें सभी तरह के प्रावधान होते है जोकि, बिल के रूप मे पारित होते है. प्रत्येक वर्ष नये बजट के साथ नये नियम व कानून के साथ पारित होते है. केन्द्रीय बजट के कई छोटे-छोटे प्रावधान है, जिनके लिये बजट बनाया जाता है, जैसे-रेल बजट ( Rail Budget)संसद मे रेल मंत्री द्वारा प्रत्येक वित्तीय वर्ष के दौरान रेल बजट प्रस्तुत किया जाता है. जिसमे आम जनता के लिये, कई नयी ट्रेनों की घोषणा की जाती है.यात्रियों के लिये ई-रेलवे की सुविधाये.ट्रेनों मे तथा प्लेटफार्म पर सुविधाये घोषित करना.एसएमएस और नेट के द्वारा बुकिंग तथा चैकिंग की सुविधा.यह दो मुख्य रूप से बनाये गये बजट होते है. जोकि, जहा तक संभव हो इसे फरवरी मे बनाया जाता है. और वित्तीय वर्ष के दौरान घोषित किया जाता है.ठीक इसी तरह केन्द्र के बजट जोकि, पूरे देश पर लागू होते है. परन्तु हर राज्य का अपना एक अलग बजट बनता है जिसमे, वह राज्य के लिये प्रावधान करती है.अन्य पढ़े:रेल बजट 2015 -16कम बजट में पाए बेस्ट स्मार्ट फ़ोनतत्काल ट्रेन टिकट बुकिंग समय में किये गये बदलाव AuthorPriyanka
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